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छत्तीसगढ़ में वनों के प्रकार (Forest Types in Chhattisgarh)

प्रस्तावना -

छत्तीसगढ़ भारत के सबसे अधिक वन संपदा वाले राज्यों में से एक है। राज्य का लगभग 44 प्रतिशत भाग वन क्षेत्र से आच्छादित है, जिससे यहाँ समृद्ध जैव विविधता पाई जाती है। वनों का राज्य की जलवायु संतुलन, पर्यावरण संरक्षण, वन्य जीवों के संरक्षण और आदिवासी जीवन-यापन में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। भौगोलिक स्थिति, वर्षा और तापमान के आधार पर छत्तीसगढ़ में विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक पाए जाने वाले वन उष्णकटिबंधीय आर्द्र पतझड़ी वन हैं। ये वन मुख्य रूप से मध्य छत्तीसगढ़ के मैदानी और पठारी क्षेत्रों में फैले हुए हैं। इन वनों में साल, सागौन, महुआ, तेंदू, बांस और बीजा जैसे वृक्ष प्रमुख रूप से पाए जाते हैं। वर्षा ऋतु के बाद इन वनों के पेड़ पत्तियाँ गिरा देते हैं, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है। ये वन आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ से तेंदूपत्ता, लाख और लकड़ी जैसे वनोपज प्राप्त होते हैं। दूसरा प्रमुख वन प्रकार उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ी वन है, जो कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। ये वन मुख्य रूप से राज्य के उत्तरी और पश्चिमी भागों में मिलते हैं। यहाँ के वृक्ष अपेक्षाकृत छोटे होते हैं और पत्तियाँ जल्दी गिरा देते हैं। पलाश, खैर, बेर और साल इस वन के प्रमुख वृक्ष हैं। ये वन पशुपालन और ईंधन लकड़ी की दृष्टि से उपयोगी माने जाते हैं।

छत्तीसगढ़ के कुछ विशेष क्षेत्रों में अर्ध-सदाबहार वन भी पाए जाते हैं, विशेषकर बस्तर संभाग के अधिक वर्षा वाले भागों में। इन वनों में हरियाली पूरे वर्ष बनी रहती है और यहाँ जैव विविधता अधिक होती है। इन वनों में औषधीय पौधों की भरपूर उपलब्धता है, जो पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में उपयोग किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त राज्य में बांस वन भी व्यापक रूप से पाए जाते हैं, जिन्हें कभी-कभी अलग वन प्रकार के रूप में भी माना जाता है। बांस छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज की आजीविका का मुख्य साधन है और इसका उपयोग घर निर्माण, कृषि उपकरण और हस्तशिल्प में किया जाता है। छत्तीसगढ़ का वन क्षेत्र न केवल प्राकृतिक संपदा है, बल्कि यह राज्य की संस्कृति और अर्थव्यवस्था की आत्मा भी है।

छत्तीसगढ़ को भारत का हर्बल स्टेट भी कहा जाता है भारतीय वन स्थिति रिर्पोट (ISFR) के अनुसार छत्तीसगढ़ के 44.21% भू-भाग में वन आवनण पाया जाता है। वन आवनण की दृष्टि से चौथा स्थान पर छत्तीसगढ़ है।

छत्तीसगढ़ की आर्थिक सामाजिक एवं संस्कृतिक क्षेत्र में वन सम्पदा का महत्वपूर्ण स्थान है।

वनों का वर्गीकरण ( Classification of Forests )-

1. जलवायु के आधार पर,

2. प्रशासनिक नियात्रंन के आधार पर,

3.वनों कि प्रजातियो के आधार पर

1. जलवायु के आधार पर -

जलवायु के आधार पर वर्गीकरन को दो भागो में बाटा गया -

(क) उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन -

इन वनों में औसत वर्षा 1000 से 1500mm तक होती है। यह पर पाए जाने वाले वनों में ग्रीष्म काल में पेड़ो के पत्ते नही गिरते अर्थात पत्तिया एक एक गिरती है तथा उस स्थान पर नये पत्ते उगते है इसी कारण इस प्रकार के वनों को सदाबहार वन भी कहते है। ये वन सघन रुप से पाए जाते है। यह वन छत्तीसगढ़ के 51.55% क्षेत्र में पाए जाते है इन वनो में प्रमुख्य वृक्ष साल, सागौन है तथा इन वन का विस्तार उत्तरी छत्तीसगढ़ के भागो में सरगुजा, जशपुर तथा दक्षिणी भागो में बस्तर, दतेवाड़ा तथा सुकमा है।

(ख) उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपातीवन -

इन वनो का क्षेत्रफल छत्तीसगढ़ के 47.69% भू-भाग पर पाया जाता है इन वनों औसत वर्षा 700 से 1000mm के आस-पास होती है इन वनों में ग्रीष्म काल में जल की कमी के कारण लगभग सभी पेड़ के पत्ते गिर जाते है जिसके कारण आग लगने का खतरा बना रहता है। यह वन क्षेत्र छत्तीसगढ़ के 47.69% भाग में पाया जाता है जो कि मध्य छत्तीसगढ़ में रायपुर, दुर्ग, राजनादगाव मुख्य जिले है इन वनों में बूबन, तेन्दू, पलाश, पहुआ, हर्रा आदि वृक्षा पाए जाते है।

2. प्रशासनिक नियात्रंन के आधार पर-

I.आरक्षित वन (Reserved Forests)

II.संरक्षित वन (Protected Forests)

III.अवगीकृत वन (Unclassified Forests)

I.आरक्षित वन (Reserved Forests)-

प्रदेश में 25910.23 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में आराक्षित वन पाए जाते है। जों कि राज्य की कुल वन क्षेत्र का 34.31 प्रतिशत है। आरक्षित वनों की मुख्य विशेषता यह है की यह मानवीय गतिविधियो पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध रहता है इन क्षेत्रों में पशुचारण, लकड़ी काटना तथा एकत्र करना व किसी का भी प्रवेश करना पूर्ण रुप से प्रतिबंधीत रहता है। इन क्षेत्रों में सेना द्वारा सुरक्षा प्रदान किया जाता है।

आरक्षित क्षेत्र में विलुप्ती के कागर पर पहुचे जीवो को सुरक्षित कर उनका विस्तार किया जाता है। जैसे पहड़ी मैंन, वन भैसा, बाघ आदि जीव । यह राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य इसी के अन्तर्गत आते है।

आरक्षित वन दंतेवाड़ा, बीजापुर और नारायणपुर जिले के अन्तर्गत आधिकांश आरक्षित वन क्षेत्र आते है जिनमे सर्वधिक क्षेत्र दन्तेवाड़ लगभग 5179 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र तथा सबसे कम कोरबा जिले मे आरक्षित वन है।

II.संरक्षित वन (Protected Forests)-

संरक्षित वन 24036.10 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में विस्तार है जो कि 40.18% (छत्तीसगढ़ आर्थिक एवं वन सर्वेक्षन 2024-25 के अनुसार) संरक्षित वनों में स्थानिय लोगो द्वारा पशुचारण, लकड़ी एकत्र करने कि छुट होती है शासन द्वारा वृक्षो की कटाई पर रोक होता है तथा शासन इन वनों को सुरक्षा प्रदान करती है।

सारक्षित वनो का विस्तार मुख्य रुप सें सरगुज और जशपुर के क्षेत्र है। सर्वधिक विस्तार 4836 वर्ग किलोमीटर के आसपास सरगुजा जिले में पाया जाता है तथा सबसे कम केवल 26 वर्ग किलोमीटर जाॅंजगीर-चाॅपा में पाया जाता।

III.अवगीकृत वन (Unclassified Forests)-

यह राज्य में 9874.45 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है जो कि प्रतिशत की दृष्टी से 16.16 है, यह इन वनों में शासकीय नियत्रंण व प्रतिबंध सबसे कम होता है स्थनिय लोगों द्वारा जीवकोपार्जन की आवश्यकता की पूर्ती यही से की जाती है। यह क्षेत्र गाॅव या शहर के आस-पास पाया जाता है इन क्षेत्रों में लकड़ी काटना, पशु चारण का कार्य बिना किसी प्रतिबंध के किया जाता है।

3.वनों कि प्रजातियो के आधार पर वर्गीकरण -

I.साल वन(Sal Forests)

II.सागौन वन(Teak Forests)

III.मिश्रित वन (Mixed Forests)

IV.बांस वन (Bamboo Forests)

I.साल वन(Sal Forests)-

साल वन छत्तीसगड़ के 24244.88 किलोमीटर वर्ग के क्षेत्रफल में विस्तृत है यह प्रतिशत की दृष्टीकोण से 40.53% वन भाग साल वन है। साल वन की लकड़ी कफी ज्यादा मजबूत व कठोर होती है जिसके कारण इसका उपयोग रेलवे में डिब्बो में, व आवशीय तथा दरवाज, खिड़की आदि में उपयोग किया जाता है।

साल वन को दो भागो में बाटा दाता है - आद्र और शुष्क साल वन

शुष्क साल वन मैकल पर्वतीय क्षेत्र व रायपुर मण्डल के उच्च भागो मे पाया जाता है। आद्र साल वन धमतरी वन मण्डाल में पाया जाता है।

II.सागौन वन(Teak Forests)-

सागौन वन 5633.13 किलोमीटर वर्ग के क्षेत्रफल में विस्तृत है अर्थात 9.42% क्षेत्र में विस्तृत है। सागौन मुख्य रुप से पहाड़ी ढाल पर पाए जाते है सागौन वृक्षो की उचाई 20-40 मीटर तक हो सकती है तथा कुछ सागौन वृक्ष 50 मीटर से भी अधिक उच्चे हो सकते है। सागौन वृक्ष का तन 1.5 से 2 मीटर तक मोट हो सकता है एक सामान्य सागौन वृक्ष का जीवनकाल 200 वर्षो तक जीवित रहने का अनुमान है तथा सागौन वृक्ष को बड़े होने में लगभग 20 वर्षो का समय लग सकता हैं। सागौन वृक्ष में दीमक नही लगता है इसी कारण इसका उपयोग रेलवे, फर्नीचर आदि कार्यो व उपयोग कि वस्तु के लिए किया जाता है।

सागौन वन का विस्तार मैकल पर्वत श्रेणी, रायपुर मण्डल, दण्डकारण्य पर्वतीय भाग तथा दक्षिण के जिलो में पाया जाता है।

III.मिश्रित वन (Mixed Forests)-

मिश्रित वन वे वन होते है जिसमें कोई एक वृक्ष न हो कर अनेको प्रकार के वृक्ष पाए जाते है उन्है मिश्रित वन कहते है छत्तीसगड़ में मिश्रित वनों का विस्तार कुल वन भू-भाग में 50.05% तथा क्षेत्रफल 29942.77 किलो मीटर वर्ग है यह छत्तीसगड़ आर्थिक एवं वन सर्वक्षण 2024-25 के अनुसार है।

मिश्रित वन में साजा, बीजा, खम्हार, तेन्दू, सेमल, हर्रा, अर्जुन, साल के वृक्ष सम्मलित है। ये वन मध्य छत्तीसगड़ के मैदानी भागों में अधिक पाए जाते है दुर्ग, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़ का पाट क्षेत्र मे पाए जाते है।

IV.बांस वन (Bamboo Forests)

बांस मिश्रित वनों में किना जाता है परन्तु बांस कि उपयोगीता के कारण इसका पृथक से अध्ययन किया जाता है यह कुल वन क्षेत्र का 6% माना जाता है जो कि छत्तीसगढ़ के कुल वनोपज का 20% का योगदान करता है दक्षिण में बस्तर के क्षेत्र में 60 से भी अधिक बास की प्रजातियो का होने का अनुमान है बांस का सर्वधिक उपयोग बांस कि कलाकृतिया बनाने, झाडु बनने, टोकरी आदि में किया जाता है दण्डकारण्य में इसका उपयोग सर्वधिक किया जाता है